Solah Somvar Vrat Vidhi : सोलह सोमवार व्रत की विधि, कथा ,उद्यापन की विधि तथा व्रत के लाभ ?

By | July 17, 2022
16 Solah Somvar Vrat Katha

सोलह सोमवार के व्रत की महिमा का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की ये व्रत माता पार्वती ने खुद किया था। इस कलयुग में कोई विशेष मनोकामना या जीवन में कोई कष्ट हो उसे दूर करने के लिए आप 16 सोमवार का व्रत करें कहते हैं कुंवारी लड़कियां एक अच्छा व सर्वगुण सम्पन पति पाने के लिए तथा शादीसुधा महिलाये अपने पति  को दीर्घायु की प्राप्ति व आपकी संतान के सुख के लिए ये व्रत रखती है। आज हम आपको बताएंगे सोलह सोमवार के व्रत की विधि,सोलह सोमवार व्रत कथा, 16 सोमवार व्रत उद्यापन सम्पूर्ण विधि, 16 सोमवार व्रत पूजा सामग्री ,सोलह सोमवार व्रत के लाभ और सोलह सोमवार व्रत कब से शुरू कर सकते हैं। 

सोलह सोमवार व्रत की कथा 

16 सोमवार व्रत की कथा (16 Solah Somvar Vrat Katha) 

एक समय की बात हैं जब शिवजी तथा माता पार्वती मृत्युलोक में भ्रमण करते हुए अमरावती नगरी में पहुंचे। अमरावती के राजा ने भव्य शिव पार्वती का मंदिर बनवाया था। भ्रमण करते समय महादेव व माता पार्वती भी वहीं ठहर गए। तभी पार्वतीजी ने कहा- हे नाथ! चलिए, आज यही हम चौसर-पांसे खेलें। खेल प्रारंभ हुआ। उसी समय पुजारीजी वहा पूजा करने आए। तभी 

माता पार्वतीजी ने पुजारीजी से पूछा-, बताइए इस खेल में जीत किसकी होगी?

पुजारी जी बोले – इस खेल में महादेवजी ही बाजी जीतेंगे। फिर महादेव व पार्वती जी खेल खेलने लगे लेकिन जब बाजी पूरी हुई तब हुआ उल्टा, जीत माता पार्वतीजी की हुई। अत:  असत्य वचन बोलने पर पुजारी पर पार्वतीजी क्रोधित हुई और कोढ़ी होने का श्राप दे दिया। इसके बाद शिव-पार्वती वहां से चले गए। कुछ समय पश्चात पुजारी जी के शरीर पर कोढ़ उत्पन्न होने लगा तथा उनका जीवन बहुत कष्ट में व्यतीत होने लगा। कुछ समय बाद अप्सराएं मंदिर में पूजा करने आईं। अप्सराओं ने पुजारी की ऐसी हालत देख कोढ़ी होने का कारण पूछा। पुजारी ने सारी बातें विस्तार में बतायी। अप्सराओं ने पुजारी को 16 सोमवार का व्रत करने को कहा और फिर पुजारी जी ने को व्रत की विधि पूछी । अप्सराओं ने  16 सोमवार की विधि विस्तार में बताई और पुजारी ने विधि व्रत का प्रारंभ किया और अंत में व्रत का उद्यापन भी किया। व्रत के प्रभाव से पुजारीजी रोगमुक्त हो गए।

थोड़े समय पश्यात पार्वती जी और महादेव वापस उसी अमरावती नगर के मंदिर में आए पुजारी को रोग मुक्त देख पार्वती जी ने महादेव से प्रश्न पूछा की पुजारी’ रोग मुक्त कैसे हुआ नाथ तभी महादेव जी ने 16 सोमवार व्रत के बारे में बताया। इस व्रत के बारें में जान माता पार्वती ने विधि पूर्वक पूरी श्रद्धा से सोलह सोमवार का व्रत किया।  फल स्वरुप कार्तिके जी की नाराजगी दूर हुई और वो मात्र सेवा में समर्पित हुए। 

कार्तिकेय जी ने पूछा- हे माता ! क्या कारण है?

कार्तिकेय ने पूछा- हे माता! क्या कारण है कि मेरा मन आपके चरणों में लगा रहता है। तभी माता पार्वतीजी ने कार्तिकेय को 16 सोमवार व्रत की महिमा  तथा व्रत विधि बताई, तब कार्तिकेय ने भी इस व्रत को करने की इच्छा जताई फिर पार्वती जी ने व्रत की सम्पूर्ण विधि बतायी और कार्तिके जी ने व्रत किया जिसके फल स्वरूप उनका बिछड़ा हुआ मित्र वापस मिल । जब मित्र ने भी इस व्रत को अपने विवाह होने की इच्छा की पूर्ति के लिए किया। इसके फलस्वरुप वह विदेश गया। वहां के राजा की कन्या का स्वयंवर था। राजा ने प्रण किया कि हथिनी जिस व्यक्ति के गले में वरमाला डाल देगी, उसी के साथ अपनी बेटी राजकुमारी का विवाह करूंगा। यह ब्राह्मण मित्र भी स्वयंवर देखने की इच्छा से वहां जाकर बैठ गया। हथिनी ने इसी ब्राह्मण मित्र को माला पहनाई तो राजा ने बड़ी धूमधाम से अपनी राजकुमारी का विवाह उसके साथ कर दिया। दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। कुछ समय पश्चात

राजकन्या ने अपने पति से सवाल पुछा  

एक दिन राजकन्या ने पूछा- हे नाथ! आपने ऐसा कौन-सा पुण्य किया जिससे रहते हथिनी ने आपके गले में वरमाला पहनाई। पति ने कहा- मैंने कार्तिकेय द्वारा बताए अनुसार 16 सोमवार का व्रत पूर्ण विधि-विधान सहित श्रद्धा-भक्ति से किया जिसके फलस्वरूप मुझे तुम्हारे जैसी सौभाग्यशाली पत्नी मिली। अब तो राजकन्या ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए यह व्रत किया करने की इच्छा जतायी और किया इसके फलस्वरूप उसे भी सर्वगुण संपन्न् पुत्र प्राप्त किया। बड़े होकर पुत्र ने भी राज्य प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। राजा की मृत्यु के पश्चात इसी ब्राह्मण कुमार को राजगद्दी मिली, फिर भी वह इस व्रत को करता रहा। एक दिन उसने अपनी पत्नी से पूजा सामग्री शिवालय ले चलने को कहा, परंतु उसने पूजा सामग्री अपनी दासियों द्वारा भिजवा दी। जब राजा ने पूजन समाप्त किया, तो आकाशवाणी हुई कि हे राजा, तुम इस पत्नी को त्याग दो नहीं तो राजपाट से हाथ धोना पड़ेगा। प्रभु की आज्ञा मानकर उसने अपनी पत्नी को महल से निकाल दिया। तब वह अपने भाग्य को कोसती हुई एक बुढ़िया के पास गई और अपना दुखड़ा सुनाया तथा बुढ़िया को बताया- मैं पूजन सामग्री राजा के कहे अनुसार शिवालय में नहीं ले गई और राजा ने मुझे निकाल दिया। बुढ़िया ने कहा- तुझे मेरा काम करना पड़ेगा। उसने स्वीकार कर लिया, तब बुढ़िया ने सूत की गठरी उसके सिर पर रखी और बाजार भेज दिया। रास्ते में आंधी आई तो सिर पर रखी गठरी उड़ गई। बुढ़िया ने डांटकर उसे भगा दिया। अब रानी बुढ़िया के यहां से चलते-चलते एक आश्रम में पहुंची। गुसाईजी उसे देखते ही समझ गए कि यह उच्च घराने की अबला विपत्ति की मारी है। वे उसे धैर्य बंधाते हुए बोले- बेटी, तू मेरे आश्रम में रह, किसी प्रकार की चिंता मत कर। रानी आश्रम में रहने लगी, परंतु जिस वस्तु को वह हाथ लगाती, उसी वस्तु में  कीड़े पड़ जाते हैं। यह देखकर गुसाईजी ने पूछा- बेटी, किस देव के अपराध से ऐसा होता है? रानी ने बताया कि मैंने अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन किया और शिवालय में पूजन के लिए नहीं गई, इससे मुझे घोर कष्ट उठाने पड़ रहा हैं।

बेटी, तुम क्यों ना 16 सोमवार का व्रत विधि के अनुसार करो

तभी रानी ने विधिपूर्वक व्रत पूर्ण किया। व्रत के प्रभाव से राजा को रानी की याद आई और दूतों को उसकी खोज पर भेजा। आश्रम में रानी को देख दूतों ने राजा को बताया। तब राजा ने वहां जाकर गुसाईजी से कहा- महाराज! यह मेरी पत्नी है। मैंने इसका परित्याग कर दिया था। कृपया इसे मेरे साथ जाने की आज्ञा दें। शिवजी की कृपा से प्रतिवर्ष 16 सोमवार का व्रत करते हुए वे आनंद से रहने लगे और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुए।

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सोलह सोमवार व्रत की पूजा सामग्री ( 16 Somvar Vrat Samagri )

  • शिव जी की मूर्ति
  • भांग
  • बेलपत्र
  • जल
  • धूप
  • दीप
  • गंगाजल
  • ताँबे का लौटा 
  • धतूरा
  • इत्र
  • सफेद चंदन
  • रोली
  • अष्टगंध
  • सफेद वस्त्र
  • नैवेद्य जिसे आधा सेर गेहूं का आटा 
  • 3 कटोरी घी 
  • 300 गुड़ 

ऐसे करें पवित्रीकरण

हाथ में जल लेकर इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए अपने ऊपर जल छिड़कें.
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

अब पूजा कि सामग्री और आसन को भी जल मंत्र उच्चारण के साथ जल छिड़क कर मंत्र शुद्ध कर लें.

**पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥**

सोलह सोमवार के व्रत की विधि (Solah Somvar Vrat Vidhi in Hindi)

शास्त्रों के अनुसार 16 सोमवार व्रत प्रारंभ करने के लिए श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में आने वाले पहले सोमवार को चुना जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय पूर्व उठकर स्नानादि कर के सबसे पहले भगवान शिव पर जल समर्पित करें। जल के बाद सफेद वस्त्र, फूल और अक्षत शिव भगवान को समर्पित करें। सफेद चंदन से भगवान को तिलक लगायें।  इसके बाद धतुरा, बेल-पत्र, भांग एवं पुष्पमाला समर्पित करें। अष्टगंध, धूप अर्पित कर, दीप जलाये। शाम को आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाएं इसके बाद सोलह सोमवार व्रत कथा को पढ़े या सुनें। ध्यान रखें कम-से-दो व्यक्ति इस कथा को अवश्य सुनें। कथा सुनने वाला भी शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर बैठें। उसके बाद शिव जी की आरती करें। दीप आरती के बाद कर्पूर जलाकर कर्पूरगौरं मंत्र से भी आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें और स्वयं भी आरती लें। इसके बाद प्रसाद के तीन भाग करें। एक भाग प्रसाद के रूप में लोगों को बांटे, दूसरा गाय को खिलाएं और तीसरा भाग स्वयं खाकर पानी पिएं। इस विधि से सोलह सोमवार का व्रत करें ऐसा करने से शिवजी आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी करेंगे। जिस संकट के समाधान का संकल्प लेकर व्रत किया जाता है वह अवश्य दूर जाएगा।

सोलह सोमवार व्रत के लाभ (Solah Somvar Vrat Benefits)

16 सोमवार व्रत बहुत ही लाभदायक होता हैं। कोई भी मनोकामना या जीवन में कोई बड़ा कष्ट हो उसके निवारण के लिए ये व्रत किया जाता हैं। कुवारी कन्याएं अच्छे पति की कामना करने के लिए भी सोलह सोमवार का व्रत किया जाता हैं। शादीसुधा महिलाये अपने पति की लम्बी आयु तथा सर्वगुण सम्पन संतान प्राप्ति के लिए करती हैं। शास्त्रों में लिखा हैं की 16 सोमवार का व्रत पूरी श्रद्धा और विधि पूर्वक करने पर शिव जी हर इच्छा पूरी करते हैं। 

16 सोमवार व्रत उद्यापन सम्पूर्ण विधि

16 सोमवार व्रत उद्यापन के लिए 16 सोमवार का व्रत विधि पूर्वक 16 की संख्या में करें उसके बाद 17 वें सोमवार को श्रावण मास के प्रथम या तृतीय सोमवार को उद्यापन के लिएउत्तम माना जाता है। वैसे कार्तिक, श्रावण, ज्येष्ठ, वैशाख या मार्गशीर्ष मास के किसी भी सोमवार को व्रत का उद्यापन किया जा सकता  हैं। सोमवार व्रत के उद्यापन में उमा-महेश और चन्द्रदेव का संयुक्त रूप से पूजन और हवन किया जाता है।

इस व्रत के उद्यापन के लिए पंडित को भी बुलाना होता हैं। 16 सोमवार व्रत उद्यापन करने के लिए सुबह जल्दी उठ कर स्नान कर के आराधना हेतु चार द्वारों का मंडप तैयार करें। वेदी बनाकर देवताओं का आह्वान करें और कलश की स्थापना करें। इसके बाद उसमें पानी से भरे हुए पात्र को रखें। पंचाक्षर मंत्र (ऊं नमः शिवाय) से भगवान् शिव जी को वहां स्थापित करें। शिव जी का अभिषेक तथा पंच तत्वों से स्नान कराएं गंध, पुष्प, धप, नैवेद्य, फल, दक्षिणा, ताम्बूल, फूल, दर्पण, आदि देवताओ को अर्पित करें। और हवन आरंभ करें। हवन की समाप्ति पर दक्षिणा, और भूषण देकर आचार्य को गो का दान दें। पूजा का सभी सामान भी उन्हें दें और बाद में उन्हें अच्छे से भोजन कराकर भेजे और आप भी भोजन ग्रहण करें।

 

 

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