अश्‍वत्थामा के जीवन से जुड़े कुछ तथ्य और रहस्य

By | May 3, 2022
Ashwathama

दोस्तों, पिछली पोस्ट में आपने अश्‍वत्थामा के जीवन के बारे में बातें जानी। अब हम आपको बताते है अश्‍वत्थामा के जीवन के ऐसे तथ्य जो आप शायद ही जानते हो…

1. क्या आप जानते है अश्‍वत्थामा एक शिक्षक भी थे ।

अश्‍वत्थामा ने अपने पिता के जीवन में संघर्ष देखा था। अपने पिता द्रोणाचार्य से उन्होंने धुर्विद्या समूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आचार्य द्रोण ने अपने प्रिय पुत्र अश्‍वत्थामा को धनुर्वेद से जुड़े सारे रहस्य और ज्ञान बता दिए। अब जब द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर में कदम रखा, उनका एक ही लक्ष्य था की वो किसी भी प्रकार से हस्तिनापुर के राजकुमारों को अपना शिष्य बनाये और उन्हें विद्या दे और इसके लिए उनकी मदद की उनके बहनोई हस्तिनापुर के कुलगुरु कृपाचार्य तथा पितामाह भीष्म ने। जब द्रोण अपने शिष्यों को विद्या देते उसी समय अश्‍वत्थामा अपने पिता की मदद करते राजकुमारों को कृप शास्त्र का ज्ञान देते साथ ही वे कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या/बाण विद्या सिखने में मदद करते। इस तरह वे अपने पिता से ज्ञान प्राप्त करते हुए राजकुमारो को शिक्षा देते जिससे उन्होंने ने एक शिक्षक भी भूमिका भी निभाई।

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2. अश्‍वत्थामा एक स्वतंत्र राजा भी थे…

पांचाल नरेश के द्वारा किया गया अपमान द्रोणाचार्य को हमेशा याद रहा। इसीलिए उन्होंने सभी राजकुमारों से गुरुदक्षिणा में पांचाल नरेश की हार मांगी। अब जब सारे राजकुमारों की विद्या संपूर्ण हुई तो गुरुद्रोण ने उनसे कहा की मुझे गुरुदक्षिणा में सिर्फ और सिर्फ पांचाल नरेश की हार चाहिए और उसे मेरे सामने बंधक के रूप में खड़ा किया जाए। चूँकि अब कुल मिलाकर 105 शिष्य थे।  कौरव और पांडवो ने अपने आप को सिद्ध करने के लिए पांचाल पर आक्रमण कर दिया परन्तु पांचाल नरेश द्रुपद ने सभी कौरवो को बंदी बना लिया। और अब वो पांडवो का इंतज़ार करने लगा लेकिन वो युधिष्टर के भाले, भीम की गदा, अर्जुन के बाण, नकुल के परशु अस्त्र तथा सहदेव के तलवारबाजी के सामने पांचाल सेना नहीं टिक पायी और अर्जुन ने उसे बंदी बना लिया। जब गुरुद्रोण के सामने उसे लाया गया तो द्रोण ने पांचाल नरेश द्रुपद को क्षमादान देकर उससे आधा राज्य अपने पुत्र अश्‍वत्थामा को देने के लिए कहा और पांचाल नरेश को समझाते हुए ताना मारा की तुम्हारा तो कोई पुत्र है नहीं तो तुम अश्‍वत्थामा को ही अपना पुत्र मानकर इसका राजतिलक अपने हाथो से कर दो।  जिससे पांचाल नरेश को  बड़ा अपमान सहन करना पड़ा। उत्तर पांचाल का राज्य अश्‍वत्थामा को दे दिया और अश्‍वत्थामा ने अपने राज्य की राजधानी अहिच्‍छ्त्र को बना लिया तथा एक स्वतंत्र राजा बन गया। 

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3. कई अस्त्र और शस्त्र का पारंगत और निपुण भी अश्‍वत्थामा थे …

आचार्य द्रोण का पुत्र होने के नाते होने पिता से समूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। आचार्य द्रोण ने अपने पुत्र मोह में आकर सारे धनुर्वेद के रहस्य बता दिये। अश्‍वत्थामा को कई तरह के दिव्यास्त्र का ज्ञान था जैसे आग्नेय, वरुणास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पर्जन्य, पन्नग, वायुव्यास्त्र, ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, ब्रह्मशिर, नागपाश आदि सभी उसने सिद्ध कर लिए थे। वह भी पिता द्रोण, भीष्म और भगवान  परशुराम की तरह का धनुर्धर बन गया। कृपाचार्य, अर्जुन व महारथी कर्ण भी उससे अधिक श्रेष्ठ नहीं थे। यहाँ ये कहना उचित ही होगा की अश्‍वत्थामा दिव्यास्त्र के मामले में कर्ण और अर्जुन से बेहतर थे किन्तु अर्जुन और कर्ण की तरह समय समय पर शक्ति प्रदर्शन न करने की वजह से अश्‍वत्थामा अपना सामर्थ नहीं दिखा पाये। 

महाभारत के युद्ध में एक समय ऐसा भी आया जब समस्त पांडव सेना और महारथियों ने अपने शस्त्र और अस्त्र निचे रख दिए और रथ से निचे उतर कर प्रणाम की मुद्रा में आने के लिए मजबूर हो गए थे। यह स्थिति स्वयं अश्‍वत्थामा ने उत्पन्न की थी। अपने पिता की छल से मृत्यु के बाद अश्‍वत्थामा ने क्रोध में आकर नारायणास्त्र का आव्हान किया जो कई ब्रम्हास्त्र और ब्रम्हाशीर जैसे दिव्यास्त्र से भी भयंकर था, नारायणास्त्र को इस संसार में त्रिदेवो और देवी भगवती के आलावा कोई अंकुश नहीं लगा सकता था। स्वयं कृष्ण ही नारायण होने के नाते ये जानते थे। युधिष्टीर की बार बार प्रार्थना करने पर श्री कृष्ण ने उन्हें बताया की में स्वयं नारायण हूँ और यह नारायणास्त्र भी मेरे ही अस्त्र भंडार का एक अस्त्र है इसलिए सुनो “नारायणास्त्र  पर अंकुश लगाने का बल और सामर्थ केवल इस ब्रम्हांड में भगवान शिव, देवी भगवती, भगवान ब्रम्हा और मुझ में हैं इसे कोई देवता भी नहीं रोक सकता तो मनुष्य के बारे में क्या कहे, इसलिए नारायणास्त्र का उत्तर देकर उसका अपमान मत कीजिये, निशस्त्र और रथहिन होकर उसके सामने हाथ जोड़ लीजिये और सारी सेना को भी यही आज्ञा दे, स्वयं नारायणास्त्र के  क्रोध, तेज और प्रभाव कम हो जायेंगे। “

4. युध्य में अश्‍वत्थामा द्वारा मारे गए कुछ योद्धाओ के नाम

अश्‍वत्थामा ने कुंतीभोज के 90 पुत्रों तथा बलानीक, शतानीक, सुत सुरथ, शत्रुंजय, पृषध्र, श्रुताह्‍य, चन्द्रसेन हेममाली, तथा जयाश्‍व जैसे वीरों को रण में मार डाला।

5. एक मात्र रूद्र अवतार जिसकी पूजा नहीं होती।

दोस्तों, यह भी एक सच्चाई है की अश्‍वत्थामा एक मात्र ऐसा रूद्र अवतार है, जिसको किसी भी रूप में पूजा नहीं जाता। शिव के इस अवतार का जन्म हमें यह संदेश देने के लिए हुआ था कि चाहे वो त्रिदेवो में से ही किसी का अवतार क्यों न हो, व्यक्ति को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए। क्रोध हमारे सोच और विचार करने की क्षमता ख़त्म कर देता हैं। एक और बात जो हमें रूद्र के इस अवतार के कारण सीखने मिलती हैं, वह यह है कि इंसान को कभी भी आधा – अधूरा नहीं सीखना चाहिए। क्योंकी ब्रम्हाशीर अस्त्र का अगर अश्‍वत्थामा को पूरा ज्ञान होता तो वह इतनी बड़ी भूल नहीं करता और न उसे श्राप मिलता।

6. अश्‍वत्थामा महाअतिमहारथी भी था।

दोस्तों,, रथी, अतिरथी, महारथी, अति-महारथी और महा – अतिमहारथी अगर आज के हिसाब से देखा जाए तो ये एक तरीके से रैंक होती (इन सभी के बारे में जानकारी के लिए नया ब्लॉग लिखा जाएगा)  महा – अतिमहारथी इस रैंक के इस सृष्टि में सिर्फ विष्णु, शिव और महाकाली ही हैं पर आपको ये बात जानकार आश्चर्य होगा की महाभारत युद्ध में केवल और केवल अश्‍वत्थामा ही ऐसा योद्धा था जो इस रैंक को पा सकता था, लेकिन उसे अपनी पूरी क्षमता (जिसे वह खुद भी नहीं जान पाया था) को उजागर करने के लिए बहुत ज्यादा क्रोधित और उत्साहित होना था। और अश्वत्थामा में यह क्षमता इसलिए थी क्योंकि वह एक रुद्र अवतार था, रूद्र जो स्वयं शिव थे। इस बात को गुरु द्रोण और भगवान श्री कृष्ण जानते थे।

7. कहाँ भटकता है अश्‍वत्थामा (Ashwathama is Still Alive)?

  1. असीरगढ़ का किला 

बुरहानपुर से 20 कि.मी. दूर एक किला है जिसका ना है असीरगढ़ का किला। कुछ लोगो का मानना है की अश्वत्थामा यही पर शिव मंदिर में पूजा करने आते है। ऐसी मान्यता है की इस किले में एक तालाब है यही वे स्न्नान करके मंदिर में पूजा करते है। आश्चर्यजनक बात यह भी है कि पहाड़ पर बने किले में बना  तालाब बुरहानपुर की तपती गर्मी में कभी भी सूखता नहीं हैं। तालाब से कुछ दूर आगे चलने पर गुप्तेश्वर महादेव मंदिर है। कहा जाता हैं की मंदिर चारो तरफ से खाइयों से घिरा है। मान्यता कुछ यह भी हैं की यही इन खाइयों में एक गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडववन ( मध्यप्रदेश के खंडवा जिला ) से मंदिर के आस-पास कही निकलता है। कुछ लोगों का कहना है कि वे उतावली नदी में स्नान करने के बाद पूजा के लिए यहां आते हैं। 

  1. जबलपुर 

ऐसा भी कहा जाता है की जबलपुर शहर के ग्वारीघाट ( नर्मदा नदी ) के किनारे अश्वत्थामा भटकते रहते हैं। स्थानीय बताते है की कभी-कभी वे अपने माथे के घाव से बह रहे खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं।

  1. मंडला जिला 

मंडला जिले में भी कुछ समय पहले तक इनके भटकने की अफवाह आई थी। कहते हैं कि माथे से रिसते घाव की वजह से वह जंगलों में चीखते रहते है।

ये कथा हैं अमर अश्वत्थामा की…

दोस्तों, उम्मीद करते है की आपको हमारे द्वारा दी गयी जानकारी अच्छी लगी होगी। आप अगर किसी और महाभारत कालीन महारथी के बारे में जानना चाहते है तो कृपया हमें कमेंट में जरूर बताये। हम कोशिश करेंगे की आपको सही और अच्छी जानकारी मिले। आपसे अनुरोध है की अगर आपको हमारी जानकारी पसंद आयी हो तो जरूर इसे शेयर भी कीजिये।

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